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श्लोक 6.34.10  |
उद्विग्ना शङ्किता चास्मि न स्वस्थं च मनो मम।
तद्भयाच्चाहमुद्विग्ना अशोकवनिकां गता॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| मैं सदैव उसके विषय में चिन्तित और शंकित रहता हूँ। मेरा मन शान्त नहीं है। मैं उसी के भय से अशोक वाटिका में आया था॥10॥ |
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| ‘I am always worried and suspicious of him. My mind is not at peace. I had come to Ashok Vatika in fear of him.॥ 10॥ |
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