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ramayan 6.34.10: मैं सदैव उसके विषय में चिन्तित और शंकित रहता हूँ। मेरा मन शान्त नहीं है। मैं उसी के भय से अशोक वाटिका में आया था॥10॥   |   ramayan सर्ग 6.34: सीता के अनुरोध से सरमा का उन्हें मन्त्रियों सहित रावण का निश्चित विचार बताना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 34: सीता के अनुरोध से सरमा का उन्हें मन्त्रियों सहित रावण का निश्चित विचार बताना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  6.34.10 
उद्विग्ना शङ्किता चास्मि न स्वस्थं च मनो मम।
तद्भयाच्चाहमुद्विग्ना अशोकवनिकां गता॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मैं सदैव उसके विषय में चिन्तित और शंकित रहता हूँ। मेरा मन शान्त नहीं है। मैं उसी के भय से अशोक वाटिका में आया था॥10॥
 
‘I am always worried and suspicious of him. My mind is not at peace. I had come to Ashok Vatika in fear of him.॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)