श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 33: सरमा का सीता को सान्त्वना देना, रावण की माया का भेद खोलना, श्रीराम के आगमन और उनके विजयी होने का विश्वास दिलाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  6.33.32 
आगतस्य हि रामस्य क्षिप्रमङ्कागतां सतीम्।
अहं द्रक्ष्यामि सिद्धार्थां त्वां शत्रौ विनिपातिते॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
शत्रु रावण के विनाश के पश्चात् मैं शीघ्र ही तुम्हारे समान पतिव्रता स्त्री को श्री रघुनाथजी की गोद में बैठा हुआ देखूँगा। अब शीघ्र ही तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा॥ 32॥
 
After the destruction of the enemy Ravana, I shall soon see a virtuous and faithful lady like you sitting in the lap of Shri Raghunathji. Now, very soon your desire will be fulfilled.॥ 32॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd