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श्लोक 6.32.5  |
आर्येण किं नु कैकेय्या: कृतं रामेण विप्रियम्।
यन्मया चीरवसनं दत्त्वा प्रव्राजितो वनम्॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| आर्य श्री राम ने कैकेयी का ऐसा कौन-सा अपराध किया था, जिसके कारण उसने उन्हें चीथड़ा देकर मेरे साथ वन में भेज दिया?’ ॥5॥ |
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| What crime did Arya Shri Ram commit against Kaikeyi, due to which she gave him a rag and sent him to the forest with me?' ॥ 5॥ |
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