श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 32: श्रीराम के मारे जाने का विश्वास करके सीता का विलाप तथा रावण का सभा में जाकर मन्त्रियों के सलाह से युद्धविषयक उद्योग करना  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  6.32.1-3 
सा सीता तच्छिरो दृष्ट्वा तच्च कार्मुकमुत्तमम्।
सुग्रीवप्रतिसंसर्गमाख्यातं च हनूमता॥ १॥
नयने मुखवर्णं च भर्तुस्तत्सदृशं मुखम्।
केशान् केशान्तदेशं च तं च चूडामणिं शुभम्॥ २॥
एतै: सर्वैरभिज्ञानैरभिज्ञाय सुदु:खिता।
विजगर्हेऽत्र कैकेयीं क्रोशन्ती कुररी यथा॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उस मस्तक और उत्तम धनुष को देखकर तथा सुग्रीव और सीता की मित्रता के विषय में हनुमान जी द्वारा कही गई बात को स्मरण करके उसने देखा कि उसके पति के नेत्र, रंग, आकृति, केश, ललाट और वह सुन्दर कंगन उसके पति के समान ही हैं। इन सब लक्षणों से अपने पति को पहचानकर वह अत्यन्त दुःखी हुई और कुररी के समान विलाप करती हुई कैकेयी की निन्दा करने लगी।॥1-3॥
 
Seeing that head and that excellent bow and remembering what Hanuman had said about Sugreeva's friendship with Sita, she observed that her husband's eyes, complexion, features, hair, forehead and that beautiful bangle were just like her husband's. Recognizing her husband by all these signs, she became very sad and started weeping like a Kurri and criticizing Kaikeyi.॥1-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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