श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 3: हनुमान जी का लङ्का का वर्णन करके भगवान् श्रीराम से सेना को कूच करने की आज्ञा देने के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  6.3.4-5 
बलस्य परिमाणं च द्वारदुर्गक्रियामपि।
गुप्तिकर्म च लङ्काया रक्षसां सदनानि च॥ ४॥
यथासुखं यथावच्च लङ्कायामसि दृष्टवान्।
सर्वमाचक्ष्व तत्त्वेन सर्वथा कुशलो ह्यसि॥ ५॥
 
 
अनुवाद
‘आपने रावण की सेना का आकार, नगर के द्वारों को अभेद्य बनाने के साधन, लंका की रक्षा के साधन और राक्षसों के महल देखे हैं - ये सब वहाँ अपने मूल रूप में सुखपूर्वक देखे गए। अतः आप उन सबका यथावत् वर्णन कीजिए; क्योंकि आप सब प्रकार से कुशल हैं।’॥4-5॥
 
‘You have seen the size of Ravana's army, the means of making the gates of the city impregnable, the means of protecting Lanka and the palaces of the demons - all these were seen there comfortably in their original form. Therefore, describe them all correctly; because you are skilled in every way.'॥ 4-5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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