श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 3: हनुमान जी का लङ्का का वर्णन करके भगवान् श्रीराम से सेना को कूच करने की आज्ञा देने के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  6.3.2 
तपसा सेतुबन्धेन सागरोच्छोषणेन च।
सर्वथापि समर्थोऽस्मि सागरस्यास्य लङ्घने॥ २॥
 
 
अनुवाद
‘मैं तपस्या द्वारा पुल बनाकर समुद्र को पार करने में तथा किसी भी उपाय से समुद्र को सुखा देने में समर्थ हूँ।॥2॥
 
‘I am capable of crossing the ocean by building a bridge through austerity and drying up the sea by any means.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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