श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 3: हनुमान जी का लङ्का का वर्णन करके भगवान् श्रीराम से सेना को कूच करने की आज्ञा देने के लिये प्रार्थना करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  6.3.10 
हृष्टप्रमुदिता लङ्का मत्तद्विपसमाकुला।
महती रथसम्पूर्णा रक्षोगणनिषेविता॥ १०॥
 
 
अनुवाद
'प्रभो! लंकापुरी आनन्द और उल्लास से परिपूर्ण है। वह विशाल नगरी उन्मत्त हाथियों और असंख्य रथों से भरी हुई है। उसमें राक्षसों के समूह सदैव निवास करते हैं॥10॥
 
‘Lord! Lankapuri is full of joy and merriment. That huge city is filled with mad elephants and innumerable chariots. Groups of demons always reside in it.॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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