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श्लोक 6.3.1  |
सुग्रीवस्य वच: श्रुत्वा हेतुमत् परमार्थवत्।
प्रतिजग्राह काकुत्स्थो हनूमन्तमथाब्रवीत्॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| सुग्रीव के ये युक्तिसंगत एवं हितकर वचन सुनकर भगवान राम ने उन्हें स्वीकार किया और हनुमान से कहा-॥1॥ |
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| Hearing these reasonable and well-intentioned words of Sugreeva, Lord Rama accepted them and said to Hanuman -॥ 1॥ |
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