श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 29: रावण का शुक और सारण को फटकारना,उसके भेजे गुप्तचरों का श्रीराम की दया से वानरों के चंगुल से छूटकर लङ्का में आना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  6.29.5 
किंचिदाविग्नहृदयो जातक्रोधश्च रावण:।
भर्त्सयामास तौ वीरौ कथान्ते शुकसारणौ॥ ५॥
 
 
अनुवाद
यह सब देखकर रावण का मन कुछ विचलित हो गया। वह क्रोधित हो उठा और बातचीत समाप्त होने पर उसने वीर शुक और सारण को डाँटा।
 
Seeing all this Ravana's heart became a little disturbed. He became angry and after the conversation was over he scolded Veer Shuka and Saran. 5.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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