श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 29: रावण का शुक और सारण को फटकारना,उसके भेजे गुप्तचरों का श्रीराम की दया से वानरों के चंगुल से छूटकर लङ्का में आना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  6.29.13 
हन्यामहं त्विमौ पापौ शत्रुपक्षप्रशंसिनौ।
यदि पूर्वोपकारैर्मे क्रोधो न मृदुतां व्रजेत्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
यदि उनके पूर्व उपकारों का स्मरण करके मेरा क्रोध शांत न हुआ होता, तो मैं अभी शत्रु की स्तुति करने वाले इन दोनों पापियों को मार डालता॥13॥
 
If my anger had not been subsided by remembering their earlier favours, I would have killed these two sinners who were praising the enemy right now.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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