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श्लोक 6.25.10  |
ततस्तद् वानरं सैन्यमचिन्त्यं लोमहर्षणम्।
संख्यातुं नाध्यगच्छेतां तदा तौ शुकसारणौ॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| वानरों की वह सेना कितनी बड़ी थी? गिनती तो दूर, उसका अंदाज़ा लगाना भी नामुमकिन था। उस विशाल सेना को देखकर ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। उस समय शुक और सारण किसी भी तरह उसकी गिनती नहीं कर पा रहे थे। |
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| How big was that army of monkeys? Forget counting it, it was impossible to even estimate it. One would get goosebumps just by looking at that huge army. At that time Shuka and Saran were not able to count it in any way. |
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