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श्लोक 6.24.44  |
न वासवेनापि सहस्रचक्षुषा
युद्धेऽस्मि शक्यो वरुणेन वा स्वयम्।
यमेन वा धर्षयितुं शराग्निना
महाहवे वैश्रवणेन वा पुन:॥ ४४॥ |
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| अनुवाद |
| यदि महासमर में सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र या वरुणदेव अथवा स्वयं यमराज अथवा मेरे बड़े भाई कुबेर भी आ जाएँ, तो भी वे अपने बाणों की अग्नि से मुझे पराजित नहीं कर सकते॥44॥ |
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| If in the great battle the thousand-eyed Indra or Varun in person or Yamraj himself or my elder brother Kuber come, then even they cannot defeat me with the fire of their arrows. 44॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुर्विंश: सर्ग: ॥ २ ४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आ र्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौबीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २ ४॥ |
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