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श्लोक 6.24.37  |
कदा समभिधावन्त मामका राघवं शरा:।
वसन्ते पुष्पितं मत्ता भ्रमरा इव पादपम्॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे वसन्त ऋतु में मतवाला भौंरा फूलों से भरे वृक्ष पर आक्रमण करता है, वैसे ही मेरे बाण उस रघुवंशी पर कब आक्रमण करेंगे?॥ 37॥ |
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| ‘Just as a drunken bumblebee attacks a tree full of flowers during the spring season, when will my arrows attack that descendant of Raghu?॥ 37॥ |
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