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स कृत्वा सागरे सेतुं तीर्त्वा च लवणोदधिम्।
एष रक्षांसि निर्धूय धन्वी तिष्ठति राघव:॥ ३१॥
अनुवाद
रघुनाथजी समुद्र पर सेतु बनाकर लवणासुर को पार करके, राक्षसों को तिनके के समान समझकर, हाथ में धनुष लिए हुए यहाँ पास में खड़े हैं।
The Lord of the Raghus, having crossed the Lavanasa by building a bridge over the sea, is standing here nearby with a bow in his hand, considering the demons to be like straws.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥