श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 22: नल के द्वारा सागर पर सौ योजन लंबे पुल का निर्माण तथा उसके द्वारा श्रीराम सहित वानरसेना का उस पार पड़ाव डालना  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  6.22.49 
दण्ड एव वरो लोके पुरुषस्येति मे मति:।
धिक् क्षमामकृतज्ञेषु सान्त्वं दानमथापि वा॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
मैं इस संसार में मनुष्य के लिए धन कमाने का सबसे बड़ा साधन कृतघ्नों को दण्ड देना मानता हूँ। ऐसे लोगों को क्षमा करना, उन्हें सांत्वना देना और दान देना धिक्कार है॥ 49॥
 
‘I believe that the greatest means of earning wealth for a man in this world is to punish those who are ungrateful. To forgive, console and give charity to such people is a shame.॥ 49॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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