श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 22: नल के द्वारा सागर पर सौ योजन लंबे पुल का निर्माण तथा उसके द्वारा श्रीराम सहित वानरसेना का उस पार पड़ाव डालना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  6.22.4 
विचिन्वन्नाभिजानासि पौरुषं नापि विक्रमम्।
दानवालय संतापं मत्तो नाम गमिष्यसि॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे दैत्यों के निवास! तुम तो चारों ओर से बहते हुए जल को ही एकत्रित करते हो। तुम मेरे बल और पराक्रम को नहीं जानते। किन्तु स्मरण रखो, (इस उपेक्षा के कारण) तुम्हें मुझसे महान् दुःख प्राप्त होगा।॥4॥
 
Abode of demons! You only collect the water flowing from all sides. You do not know my strength and prowess. But remember, (due to this neglect) you will receive great anguish from me.'॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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