श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 22: नल के द्वारा सागर पर सौ योजन लंबे पुल का निर्माण तथा उसके द्वारा श्रीराम सहित वानरसेना का उस पार पड़ाव डालना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  6.22.32 
उत्तरेणावकाशोऽस्ति कश्चित् पुण्यतरो मम।
द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! जैसे आप संसार में सर्वत्र विख्यात और पवित्र हैं, वैसे ही मेरे उत्तर में द्रुमकुल्य नाम से प्रसिद्ध एक अत्यन्त पवित्र देश है ॥ 32॥
 
Lord! Just as you are renowned and pious everywhere in the world, similarly to my north there is a very sacred country known as Drumkulya. ॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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