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श्लोक 6.22.3  |
मत्कार्मुकविसृष्टेन शरवर्षेण सागर।
परं तीरं गमिष्यन्ति पद्भिरेव प्लवंगमा:॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| हे समुद्र! जब मेरे धनुष से निकले बाणों की वर्षा से तुम्हारी ऐसी दशा होगी, तब वानर पैदल ही तुम्हारे उस पार पहुँच जायेंगे। |
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| O Ocean! When you will be in such a state due to the shower of arrows from my bow, then the monkeys will reach the other side of you on foot. |
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