श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 22: नल के द्वारा सागर पर सौ योजन लंबे पुल का निर्माण तथा उसके द्वारा श्रीराम सहित वानरसेना का उस पार पड़ाव डालना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  6.22.2 
शरनिर्दग्धतोयस्य परिशुष्कस्य सागर।
मया निहतसत्त्वस्य पांसुरुत्पद्यते महान्॥ २॥
 
 
अनुवाद
‘समुद्र! मेरे बाण तुम्हारा सारा जल जला देंगे, तुम सूख जाओगे और तुम्हारे अन्दर रहने वाले सभी जीव नष्ट हो जाएँगे। उस स्थिति में तुम्हारे स्थान पर जल के स्थान पर बहुत बड़ी मात्रा में बालू उग आएगी॥ 2॥
 
‘Ocean! My arrows will burn all your water, you will dry up and all the living beings living inside you will perish. In that condition, instead of water, a huge amount of sand will grow in your place.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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