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श्लोक 6.21.35  |
अन्तर्हितैश्चापि तथान्तरिक्षे
ब्रह्मर्षिभिश्चैव सुरर्षिभिश्च।
शब्द: कृत: कष्टमिति ब्रुवद्भि-
र्मामेति चोक्त्वा महता स्वरेण ॥ ३ ५॥ |
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| अनुवाद |
| उसी समय अन्तरिक्ष में अदृश्य रूप में उपस्थित महर्षि एवं दिव्य ऋषिगण भी जोर से चिल्लाकर कहने लगे, ‘हाय! यह तो बड़े संकट की बात है!’ तथा ‘अब और नहीं, अब और नहीं!’ |
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| At the same time, the great sages and divine sages present in invisible form in the space also shouted loudly, saying, 'Alas! This is a matter of great trouble!' and 'No more, no more!' |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकविंश: सर्ग: ॥ २ १॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २ १॥ |
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