श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 21: श्रीराम का समुद्र के तट पर तीन दिनों तक धरना देने पर भी समुद्र के दर्शन न देने से बाण मारकर विक्षुब्ध कर देना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  6.21.34 
एतद्विनापि ह्युदधेस्तवाद्य
सम्पत्स्यते वीरतमस्य कार्यम्।
भवद्विधा: क्रोधवशं न यान्ति
दीर्घं भवान् पश्यतु साधुवृत्तम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
(तब उन्होंने कहा—) 'भाई! तुम वीर हो। इस समुद्र को नष्ट किए बिना भी तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जाएगा। तुम्हारे जैसे महापुरुष क्रोध के अधीन नहीं होते। अब तुम कोई ऐसा अच्छा उपाय सोचो जो दीर्घकाल तक काम आ सके—कोई और अच्छी युक्ति सोचो।'॥34॥
 
(Then he said—)'Brother! You are a brave soul. Your task will be accomplished even without destroying this ocean. Great men like you are not subject to anger. Now you should look at some good solution which can be used for a long time—think of some other good strategy.'॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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