श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 21: श्रीराम का समुद्र के तट पर तीन दिनों तक धरना देने पर भी समुद्र के दर्शन न देने से बाण मारकर विक्षुब्ध कर देना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  6.21.25 
एवमुक्त्वा धनुष्पाणि: क्रोधविस्फारितेक्षण:।
बभूव रामो दुर्धर्षो युगान्ताग्निरिव ज्वलन्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर वीर प्रभु श्री रामजी ने अपना धनुष हाथ में ले लिया और क्रोध से आँखें फाड़कर देखने लगे और प्रलय की अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठे॥ 25॥
 
Having said this, the valiant Lord Shri Ram took his bow in his hands. He began to stare with his eyes wide open in anger and became as blazing as the fire of destruction.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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