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श्लोक 6.21.16-17h  |
न साम्ना शक्यते कीर्तिर्न साम्ना शक्यते यश:॥ १६॥
प्राप्तुं लक्ष्मण लोकेऽस्मिञ्जयो वा रणमूर्धनि। |
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| अनुवाद |
| लक्ष्मण! इस संसार में समनीति (शान्ति) से न तो यश प्राप्त होता है, न कीर्ति फैलती है और न ही युद्ध में विजय प्राप्त होती है। |
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| Lakshmana! In this world, neither fame can be achieved nor fame can be spread nor victory can be achieved in a war through Samneeti (peace). |
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