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आत्मप्रशंसिनं दुष्टं धृष्टं विपरिधावकम्॥ १५॥
सर्वत्रोत्सृष्टदण्डं च लोक: सत्कुरुते नरम्।
अनुवाद
जो व्यक्ति अपनी प्रशंसा करता है, दुष्ट है, निर्लज्ज है, सब जगह आक्रमण करता है और अच्छे-बुरे दोनों को कठोर दंड देता है, उसका सभी लोग आदर करते हैं।॥ 15 1/2॥
Everyone respects a person who praises himself, is wicked, impudent, attacks everywhere and punishes both good and bad people severely.॥ 15 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥