श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 19: विभीषण का आकाश से उतरकर भगवान् श्रीराम के चरणों की शरण लेना, श्रीराम का रावण-वध की प्रतिज्ञा करना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  6.19.38 
किमर्थं नौ नरव्याघ्र न रोचिष्यति राघव।
विभीषणेन यत् तूक्तमस्मिन् काले सुखावहम्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
हे नरपुत्र रघुनन्दन! इस समय विभीषण के कहे हुए मधुर वचन हम दोनों को क्यों प्रिय नहीं लगेंगे?॥ 38॥
 
O son of the man Raghunandan! Why won't the soothing words spoken by Vibhishan be liked by both of us at this time?॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)