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ramayan 6.18.37: 'मेरा अन्तःकरण भी विभीषण को शुद्ध मानता है। हनुमानजी ने भी अनुमान और अनुभूति से उसे भीतर-बाहर से भली-भाँति परख लिया है।' 37.   |   ramayan सर्ग 6.18: भगवान् श्रीराम का शरणागत की रक्षा का महत्त्व एवं अपना व्रत बताकरविभीषण से मिलना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.18.37 
मम चाप्यन्तरात्मायं शुद्धं वेत्ति विभीषणम्।
अनुमानाच्च भावाच्च सर्वत: सुपरीक्षित:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
'मेरा अन्तःकरण भी विभीषण को शुद्ध मानता है। हनुमानजी ने भी अनुमान और अनुभूति से उसे भीतर-बाहर से भली-भाँति परख लिया है।' 37.
 
‘My conscience also considers Vibhishan to be pure. Hanumanji too has thoroughly tested him from inside and outside by inference and feeling. 37.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)