श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 18: भगवान् श्रीराम का शरणागत की रक्षा का महत्त्व एवं अपना व्रत बताकरविभीषण से मिलना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  6.18.30 
विनष्ट: पश्यतस्तस्य रक्षिण: शरणं गत:।
आनाय सुकृतं तस्य सर्वं गच्छेदरक्षित:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
यदि शरणागत मनुष्य को रक्षा न मिले और वह रक्षक की दृष्टि के सामने ही नष्ट हो जाए, तो वह अपने साथ उसके सारे पुण्य कर्म भी ले जाता है ॥30॥
 
If a person who has come seeking refuge does not get protection and perishes before the eyes of the protector, then he takes all his good deeds with him.॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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