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श्लोक 6.18.30  |
विनष्ट: पश्यतस्तस्य रक्षिण: शरणं गत:।
आनाय सुकृतं तस्य सर्वं गच्छेदरक्षित:॥ ३०॥ |
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| अनुवाद |
| यदि शरणागत मनुष्य को रक्षा न मिले और वह रक्षक की दृष्टि के सामने ही नष्ट हो जाए, तो वह अपने साथ उसके सारे पुण्य कर्म भी ले जाता है ॥30॥ |
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| If a person who has come seeking refuge does not get protection and perishes before the eyes of the protector, then he takes all his good deeds with him.॥ 30॥ |
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