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ramayan 6.18.3: जो मित्रता से मेरे पास आया है, उसे मैं किसी भी प्रकार त्याग नहीं सकता। संभव है कि उसमें कुछ दोष हों, परंतु दोषी को आश्रय देना सज्जन के लिए निन्दनीय नहीं है (इसलिए मैं विभीषण को अवश्य अपना लूँगा)॥3॥   |   ramayan सर्ग 6.18: भगवान् श्रीराम का शरणागत की रक्षा का महत्त्व एवं अपना व्रत बताकरविभीषण से मिलना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 18: भगवान् श्रीराम का शरणागत की रक्षा का महत्त्व एवं अपना व्रत बताकरविभीषण से मिलना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  6.18.3 
मित्रभावेन सम्प्राप्तं न त्यजेयं कथंचन।
दोषो यद्यपि तस्य स्यात् सतामेतदगर्हितम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जो मित्रता से मेरे पास आया है, उसे मैं किसी भी प्रकार त्याग नहीं सकता। संभव है कि उसमें कुछ दोष हों, परंतु दोषी को आश्रय देना सज्जन के लिए निन्दनीय नहीं है (इसलिए मैं विभीषण को अवश्य अपना लूँगा)॥3॥
 
I cannot in any way abandon the one who has come to me with friendship. It is possible that he may have some faults, but giving shelter to a guilty person is not condemnable for a good person (so I will definitely adopt Vibhishan)'॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)