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श्लोक 6.18.18-19  |
राक्षसो जिह्मया बुद्धॺा संदिष्टोऽयमिहागत:।
प्रहर्तुं त्वयि विश्वस्ते विश्वस्ते मयि वानघ॥ १८॥
लक्ष्मणे वा महाबाहो स वध्य: सचिवै: सह।
रावणस्य नृशंसस्य भ्राता ह्येष विभीषण:॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| 'निष्पाप श्री राम! यह राक्षस रावण के कहने पर मन में कुबुद्धि लेकर यहाँ आया है। जब हम उस पर विश्वास कर लेंगे और उसकी ओर से निश्चिंत हो जाएँगे, तब वह आप पर, मुझ पर अथवा लक्ष्मण पर भी आक्रमण कर सकता है। अतः हे पराक्रमी! क्रूर रावण के भाई इस विभीषण को उसके मन्त्रियों सहित मार डालना ही उचित है।'॥18-19॥ |
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| ‘Innocent Shri Ram! This demon has come here at the behest of Ravana with evil intentions in his mind. When we will believe him and become carefree about him, then he can attack you, me or even Lakshman. Therefore, O mighty one! It is appropriate to kill this Vibhishana, brother of the cruel Ravana, along with his ministers.'॥ 18-19॥ |
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