श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 18: भगवान् श्रीराम का शरणागत की रक्षा का महत्त्व एवं अपना व्रत बताकरविभीषण से मिलना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  6.18.1 
अथ राम: प्रसन्नात्मा श्रुत्वा वायुसुतस्य ह।
प्रत्यभाषत दुर्धर्ष: श्रुतवानात्मनि स्थितम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वायुनन्दन हनुमान जी के मुख से अपने मन में बैठी हुई बात सुनकर महाबली भगवान श्री राम का हृदय प्रसन्न हो गया। वे इस प्रकार बोले: 1॥
 
Hearing what was sitting in his mind from the mouth of Vayunandan Hanuman ji, the heart of the formidable brave Lord Shri Ram became happy. He spoke like this: 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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