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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 17: विभीषण का श्रीराम की शरण में आना और श्रीराम का अपने मन्त्रियों के साथ उन्हें आश्रय देने के विषय में विचार करना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  6.17.55 
चारप्रणिहितं युक्तं यदुक्तं सचिवैस्तव।
अर्थस्यासम्भवात् तत्र कारणं नोपपद्यते॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
‘आपके मंत्रियों ने जिस प्रकार गुप्तचर नियुक्त करने की बात कही है, उसका कोई युक्तिसंगत कारण नहीं है, क्योंकि उसके पीछे कोई प्रयोजन ही नहीं है। (जो दूर रहता है और जिसकी कहानी ज्ञात नहीं होती, उसके लिए गुप्तचर नियुक्त किया जाता है। जो सामने खड़ा है और अपनी कहानी स्पष्ट रूप से कह रहा है, उसके लिए गुप्तचर भेजने की क्या आवश्यकता है?)॥ 55॥
 
‘There is no logical reason to appoint spies as your ministers have talked about doing so, as there is no purpose behind it. (A spy is appointed for someone who lives far away and whose story is not known. What is the need to send a spy for someone who is standing in front and is clearly telling his story?)॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)