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श्लोक 6.17.54  |
ऋते नियोगात् सामर्थ्यमवबोद्धुं न शक्यते।
सहसा विनियोगोऽपि दोषवान् प्रतिभाति मे॥ ५४॥ |
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| अनुवाद |
| विभीषण शरण के योग्य है या नहीं - इसका निर्णय उसे कोई कार्य दिए बिना नहीं हो सकता और उसे अचानक किसी कार्य में लगाना भी मुझे अनुचित प्रतीत होता है॥ 54॥ |
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| Whether Vibhishana is worthy of shelter or not - this cannot be decided without assigning him some work and suddenly engaging him in any work also seems wrong to me.॥ 54॥ |
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