श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 17: विभीषण का श्रीराम की शरण में आना और श्रीराम का अपने मन्त्रियों के साथ उन्हें आश्रय देने के विषय में विचार करना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  6.17.46 
बद्धवैराच्च पापाच्च राक्षसेन्द्राद् विभीषण:।
अदेशकाले सम्प्राप्त: सर्वथा शंक्यतामयम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
राक्षसराज रावण महापापी है। उसने हमसे शत्रुता की है और यह विभीषण उसी के यहाँ से आ रहा है। वास्तव में उसके आने का न तो यह समय है और न ही यह स्थान। अतः उसके विषय में सब प्रकार से शंका करनी चाहिए।॥ 46॥
 
‘The demon king Ravana is a great sinner. He has made enmity with us and this Vibhishan is coming from him. In fact this is neither the time nor the place for his arrival. Therefore one should be suspicious about him in every way.’॥ 46॥
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