श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 17: विभीषण का श्रीराम की शरण में आना और श्रीराम का अपने मन्त्रियों के साथ उन्हें आश्रय देने के विषय में विचार करना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  6.17.41 
अर्थानर्थौ विनिश्चित्य व्यवसायं भजेत ह।
गुणत: संग्रहं कुर्याद् दोषतस्तु विसर्जयेत्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
अतः गुण-दोषों पर विचार करके पहले यह निश्चय कर लेना चाहिए कि यह मनुष्य हितकारी होगा या अहितकारी (यह अच्छा करेगा या बुरा) यदि इसमें गुण हों तो इसे ग्रहण कर लो और यदि अवगुण दिखाई दें तो इसका त्याग कर दो॥ 41॥
 
‘Therefore, after considering the merits and demerits, one should first decide whether this person will be beneficial or harmful (will he do good or bad). If he has merits, then accept him and if demerits are seen, then abandon him.॥ 41॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd