श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 17: विभीषण का श्रीराम की शरण में आना और श्रीराम का अपने मन्त्रियों के साथ उन्हें आश्रय देने के विषय में विचार करना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  6.17.39 
शत्रो: सकाशात् सम्प्राप्त: सर्वथा तर्क्य एव हि।
विश्वासनीय: सहसा न कर्तव्यो विभीषण:॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! विभीषण शत्रु की ओर से आया है, अतः अब उस पर संदेह करना चाहिए। उसे अचानक विश्वासपात्र नहीं बनाना चाहिए ॥39॥
 
Lord! Vibhishana has come from the enemy, hence we should doubt him now. He should not be made a confidant suddenly. 39॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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