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श्लोक 6.17.39  |
शत्रो: सकाशात् सम्प्राप्त: सर्वथा तर्क्य एव हि।
विश्वासनीय: सहसा न कर्तव्यो विभीषण:॥ ३९॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रभु! विभीषण शत्रु की ओर से आया है, अतः अब उस पर संदेह करना चाहिए। उसे अचानक विश्वासपात्र नहीं बनाना चाहिए ॥39॥ |
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| Lord! Vibhishana has come from the enemy, hence we should doubt him now. He should not be made a confidant suddenly. 39॥ |
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