श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 17: विभीषण का श्रीराम की शरण में आना और श्रीराम का अपने मन्त्रियों के साथ उन्हें आश्रय देने के विषय में विचार करना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  6.17.33 
सुहृदामर्थकृच्छ्रेषु युक्तं बुद्धिमता सदा।
समर्थेनोपसंदेष्टुं शाश्वतीं भूतिमिच्छता॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
‘जो बुद्धिमान् एवं योग्य पुरुष अपने मित्रों की स्थायी उन्नति चाहता है, उसे अपने कर्तव्य के विषय में संदेह होने पर सदैव अपनी सहमति दे देनी चाहिए।’ 33॥
 
‘An intelligent and capable man, who wants permanent progress of his friends, should always give his consent when there is doubt regarding the duty of his duty.’ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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