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ramayan 6.17.24: मित्रों की, जंगली जातियों की और परम्परागत सेवकों की सेनाएँ तो इकट्ठी की जा सकती हैं; परन्तु शत्रुओं से मिल गए लोगों की सेनाएँ कभी इकट्ठी नहीं करनी चाहिए॥24॥   |   ramayan सर्ग 6.17: विभीषण का श्रीराम की शरण में आना और श्रीराम का अपने मन्त्रियों के साथ उन्हें आश्रय देने के विषय में विचार करना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.17.24 
मित्राटविबलं चैव मौलभृत्यबलं तथा।
सर्वमेतद् बलं ग्राह्यं वर्जयित्वा द्विषद्बलम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
मित्रों की, जंगली जातियों की और परम्परागत सेवकों की सेनाएँ तो इकट्ठी की जा सकती हैं; परन्तु शत्रुओं से मिल गए लोगों की सेनाएँ कभी इकट्ठी नहीं करनी चाहिए॥24॥
 
The armies of friends, of wild tribes and of traditional servants can all be gathered; but the armies of those who have joined the enemy should never be gathered.॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)