श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 17: विभीषण का श्रीराम की शरण में आना और श्रीराम का अपने मन्त्रियों के साथ उन्हें आश्रय देने के विषय में विचार करना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  6.17.19 
प्रविष्ट: शत्रुसैन्यं हि प्राप्त: शत्रुरतर्कित:।
निहन्यादन्तरं लब्ध्वा उलूको वायसानिव॥ १९॥
 
 
अनुवाद
प्रभु! आज एक शत्रु, जो राक्षस होकर पहले हमारे शत्रु रावण की सेना में सम्मिलित हुआ था, अब अचानक हमारी सेना में घुस आया है। वह अवसर पाकर हमें उसी प्रकार मार डालेगा, जैसे उल्लू कौओं को मारता है॥19॥
 
‘Prabhu! Today an enemy, who being a demon had earlier joined the army of our enemy Ravana, has now suddenly come to enter our army. He will get an opportunity and kill us in the same way as an owl kills crows.॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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