श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 15: इन्द्रजित द्वारा विभीषण का उपहास तथा विभीषण का उसे फटकारकर सभा में अपनी उचित सम्मति देना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  6.15.7 
सोऽहं सुराणामपि दर्पहन्ता
दैत्योत्तमानामपि शोककर्ता।
कथं नरेन्द्रात्मजयोर्न शक्तो
मनुष्ययो: प्राकृतयो: सुवीर्य:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जो देवताओं के भी गर्व को चूर कर सकता है, जो बड़े-बड़े दानवों को भी शोकाकुल कर सकता है और जो महान बल और पराक्रम से संपन्न है, वह मुझ जैसे मनुष्य जाति के दो साधारण राजकुमारों का सामना कैसे नहीं कर सकता?॥7॥
 
How can one who can crush the pride of even the gods, who can make even the greatest of demons mourn and who is blessed with great strength and valour, not be able to face two ordinary princes of the human race like me?'॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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