श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 15: इन्द्रजित द्वारा विभीषण का उपहास तथा विभीषण का उसे फटकारकर सभा में अपनी उचित सम्मति देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  6.15.3 
सत्त्वेन वीर्येण पराक्रमेण
धैर्येण शौर्येण च तेजसा च।
एक: कुलेऽस्मिन् पुरुषो विमुक्तो
विभीषणस्तात कनिष्ठ एष:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
पिता जी! हमारे इस राक्षस कुल में केवल ये छोटे मामा विभीषण ही ऐसे हैं जो बल, वीर्य, ​​शौर्य, धैर्य, पराक्रम और तेज से रहित हैं॥3॥
 
father! This younger uncle Vibhishan is the only one in this demon clan of ours who is devoid of strength, semen, bravery, patience, bravery and brilliance. 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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