श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 15: इन्द्रजित द्वारा विभीषण का उपहास तथा विभीषण का उसे फटकारकर सभा में अपनी उचित सम्मति देना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  6.15.2 
किं नाम ते तात कनिष्ठ वाक्य-
मनर्थकं वै बहुभीतवच्च।
अस्मिन् कुले योऽपि भवेन्न जात:
सोऽपीदृशं नैव वदेन्न कुर्यात्॥ २॥
 
 
अनुवाद
मेरे छोटे मामा! आप यह कैसी बकवास कर रहे हैं, मानो बहुत डरे हुए हों? जो आदमी इस कुल में पैदा नहीं हुआ, वह न तो ऐसी बात कहेगा, न ऐसा करेगा॥ 2॥
 
My younger uncle! What nonsense are you saying as if you are very scared? A man who has not been born in this family will neither say such a thing nor do such a thing.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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