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श्लोक 6.15.14  |
धनानि रत्नानि सुभूषणानि
वासांसि दिव्यानि मणींश्च चित्रान्।
सीतां च रामाय निवेद्य देवीं
वसेम राजन्निह वीतशोका:॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| अतः हे राजन! हम लोग अपना धन, रत्न, सुन्दर आभूषण, दिव्य वस्त्र, विचित्र रत्न और देवी सीता को श्री रामजी की सेवा में समर्पित करके ही इस नगर में बिना किसी शोक के निवास कर सकते हैं। ॥14॥ |
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| "Therefore, O King! We can reside in this city without any grief only after dedicating our wealth, precious stones, beautiful ornaments, divine clothes, strange gems and Goddess Sita to the service of Shri Rama." ॥14॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पञ्चदश: सर्ग: ॥ १ ५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ५॥ |
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