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श्लोक 6.14.22  |
परस्य वीर्यं स्वबलं च बुद्ध्वा
स्थानं क्षयं चैव तथैव वृद्धिम्।
तथा स्वपक्षेऽप्यनुमृश्य बुद्ध्या
वदेत् क्षमं स्वामिहितं स मन्त्री॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| वास्तव में सच्चा मंत्री वही है जो अपने और शत्रु पक्ष के बल और पराक्रम को समझकर तथा बुद्धि द्वारा दोनों पक्षों की स्थिति, हानि और वृद्धि पर विचार करके वही बात कहे जो स्वामी के लिए हितकर और उचित हो।॥22॥ |
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| In reality, a true minister is one who, after understanding the strength and prowess of his own and the enemy's side and after considering the situation, loss and growth of both sides through his intellect, says only that thing which is beneficial and appropriate for the master.'॥ 22॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतुर्दश: सर्ग: ॥ १ ४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ४॥ |
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