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श्लोक 6.13.5  |
लब्धकामस्य ते पश्चादागमिष्यति किं भयम्।
प्राप्तमप्राप्तकालं वा सर्वं प्रतिविधास्यसे॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| ‘जब तुम्हारी इच्छा पूरी हो जाएगी, तब तुम्हें कौन-सा भय होगा? वर्तमान अथवा भविष्य में यदि कोई भय उत्पन्न होगा, तो वह सब भय उचित रूप से टल जाएगा।॥5॥ |
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| ‘When your desire is fulfilled, what fear will come upon you? If any fear arises in the present or the future, then all that fear will be averted appropriately.॥ 5॥ |
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