श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 128: भरत का श्रीराम को राज्य लौटाना, श्रीराम की नगरयात्रा, राज्याभिषेक, वानरों की विदार्इ तथा ग्रन्थ का माहात्म्य  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  6.128.97 
राघवश्चापि धर्मात्मा प्राप्य राज्यमनुत्तमम्।
ईजे बहुविधैर्यज्ञै: ससुहृज्ज्ञातिबान्धव:॥ ९७॥
 
 
अनुवाद
धर्मात्मा श्री रामजी ने अयोध्या का परम राज्य प्राप्त करके अपने बन्धु-बान्धवों और बन्धुओं के साथ अनेक प्रकार के यज्ञ किए॥97॥
 
After attaining the supreme kingdom of Ayodhya, the virtuous Shri Ram performed many types of yagyas along with his friends, relatives and brothers. 97॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)