श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 128: भरत का श्रीराम को राज्य लौटाना, श्रीराम की नगरयात्रा, राज्याभिषेक, वानरों की विदार्इ तथा ग्रन्थ का माहात्म्य  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  6.128.45 
तच्च मद्भवनं श्रेष्ठं साशोकवनिकं महत्।
मुक्तावैदूर्यसंकीर्णं सुग्रीवाय निवेदय॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
भरत! अशोक वाटिका से घिरा हुआ, मोतियों और लाजवन्तों से जड़ा हुआ मेरा विशाल महल सुग्रीव को दे दो।'
 
Bharat! Give my huge palace surrounded by Ashoka grove and studded with pearls and lapis lazuli to Sugreeva.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)