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श्लोक 6.127.64  |
पुरोहितस्यात्मसखस्य राघवो
बृहस्पते: शक्र इवामराधिप:।
निपीडॺ पादौ पृथगासने शुभे
सहैव तेनोपविवेश वीर्यवान्॥ ६४॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् महाबली श्री रघुनाथजी ने अपने मित्र पुरोहित वसिष्ठपुत्र सुयज्ञ (अथवा अपने श्रेष्ठ सहायक पुरोहित वसिष्ठजी) के चरणों को उसी प्रकार स्पर्श किया, जैसे देवराज इन्द्र बृहस्पतिजी के चरण स्पर्श करते हैं। फिर उन्हें एक सुन्दर पृथक आसन पर बिठाया और स्वयं भी उनके साथ दूसरे आसन पर बैठ गए॥64॥ |
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| After that, the mighty Shri Raghunathji touched the feet of his friend priest Vasisthaputra Suyajna (or his best assistant priest Vasisthaji) in the same way as Devraj Indra touches the feet of Brihaspatiji. Then he made them sit on a beautiful separate seat and he himself also sat on another seat along with them. 64॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तविंशत्यधिकशततम: सर्ग: ॥ १ २७॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ २७॥ |
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