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श्लोक 6.126.55  |
तत: स वाक्यैर्मधुरैर्हनूमतो
निशम्य हृष्टो भरत: कृताञ्जलि:।
उवाच वाणीं मनस: प्रहर्षिणीं
चिरस्य पूर्ण: खलु मे मनोरथ:॥ ५५॥ |
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| अनुवाद |
| हनुमानजी के मधुर वचनों में सारी बातें सुनकर भरतजी बहुत प्रसन्न हुए और हाथ जोड़कर मन को प्रसन्न करने वाले वचन बोले- 'आज बहुत दिनों के बाद मेरी मनोकामना पूरी हुई है।' |
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| Having heard everything in the sweet words of Hanuman, Bharata became very pleased and with folded hands spoke in words that brought joy to the mind - 'Today, after a long time, my wish has been fulfilled.' |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे आदिकाव्ये युद्धकाण्डे ष ड् विंशत्यधिकशततम: सर्ग: ॥ १ २६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १ २६॥ |
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