श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 126: हनुमान्जी का भरत को श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के वनवाससम्बन्धी सारे वृत्तान्तों को सुनाना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  6.126.54 
तां गङ्गां पुनरासाद्य वसन्तं मुनिसंनिधौ।
अविघ्नं पुष्ययोगेन श्वो रामं द्रष्टुमर्हसि॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
वहाँ से वे गंगा तट पर आकर प्रयाग में भारद्वाज ऋषि के पास ठहरे हैं। कल पुष्य नक्षत्र के अवसर पर तुम निर्विघ्न श्री राम के दर्शन कर सकोगे।॥ 54॥
 
‘From there he has come to the bank of Ganga and is staying near sage Bharadwaj in Prayag. Tomorrow on the occasion of Pushya Nakshatra you will be able to see Shri Ram without any hindrance.’॥ 54॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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