श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 125: हनुमान्जी का निषादराज गुह तथा भरतजी को श्रीराम के आगमन की सूचना देना और प्रसन्न हुए भरत का उन्हें उपहार देने की घोषणा करना  »  श्लोक 8-11
 
 
श्लोक  6.125.8-11 
हरणं चापि वैदेह्या रावणेन बलीयसा।
सुग्रीवेण च संवादं वालिनश्च वधं रणे॥ ८॥
मैथिल्यन्वेषणं चैव यथा चाधिगता त्वया।
लङ्घयित्वा महातोयमापगापतिमव्ययम्॥ ९॥
उपयानं समुद्रस्य सागरस्य च दर्शनम्।
यथा च कारित: सेतू रावणश्च यथा हत:॥ १०॥
वरदानं महेन्द्रेण ब्रह्मणा वरुणेन च।
महादेवप्रसादाच्च पित्रा मम समागमम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
महाबली रावण द्वारा सीता का हरण, सुग्रीव से उसकी बातचीत, युद्धभूमि में बालि का वध, सीता की खोज, जल से भरे हुए विशाल समुद्र को पार करके सीता को प्राप्त करने का, मेरे समुद्र तट पर जाने का, समुद्र को दिखाने का, उस पर सेतु बनाने का, रावण के वध का, इंद्र, ब्रह्मा और वरुण से मिलकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का, तथा महादेवजी की कृपा से पिता से मिलने का वृत्तांत उनसे कहो॥8-11॥
 
Tell him the story of Sita being abducted by the mighty Ravana, of his conversation with Sugreeva, of the killing of Vali on the battlefield, of the search for Sita, of how you found Sita by crossing the vast ocean filled with great water, of my going to the seashore, of showing the ocean, of building a bridge over it, of the killing of Ravana, of meeting Indra, Brahma and Varuna and receiving their blessings, and of meeting father by the grace of Mahadevji.॥ 8-11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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